जामिया विवाद से परिसरों में अभिव्यक्ति की बहस तेज

जामिया मिलिया इस्लामिया में दीवारों पर उकेरे गए नारों को लेकर छिड़ा विवाद एक बड़े सवाल को फिर सामने ला रहा है। विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा कहां तक होनी चाहिए और अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी किसकी है। यह बहस नई नहीं है, लेकिन हर बार यह और तीखी हो जाती है।
एक पक्ष का कहना है कि विश्वविद्यालय विचारों के आदान-प्रदान की जगह हैं। छात्रों को अपनी बात कहने का अधिकार है और असहमति लोकतंत्र की जान है। उनका तर्क है कि नारों को लेकर इतना बड़ा बवाल खड़ा करना अभिव्यक्ति को दबाने जैसा है।
दूसरे पक्ष का मानना है कि आजादी के नाम पर परिसर को किसी खास विचारधारा का अड्डा नहीं बनने दिया जा सकता। विश्वविद्यालय का पहला काम पढ़ाई है और ऐसी गतिविधियां शैक्षणिक माहौल को बिगाड़ती हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह नियमों का पालन सुनिश्चित करे।
सच्चाई इन दोनों के बीच में है। छात्रों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसके साथ परिसर की गरिमा भी बनी रहनी चाहिए। जरूरत इस बात की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्र संगठन और सरकार मिलकर ऐसा रास्ता निकालें, जहां संवाद की गुंजाइश हो और टकराव की नहीं।
तस्वीर: Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)
