लंबी हिरासत सजा नहीं बन सकती, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी आपराधिक मामले में आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, मुकदमे से पहले अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उचित नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि लंबे समय तक विचाराधीन कैद को बिना सुनवाई की सजा का रूप लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार को अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना।
यह टिप्पणी राजस्थान के जल जीवन मिशन से जुड़े कथित टेंडर भ्रष्टाचार मामले में पूर्व मंत्री महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को नियमित जमानत देते हुए की गई। मामले में 22 आरोपी, तीन आरोपपत्र, अभियोजन के 124 गवाह और लगभग 20,000 पन्नों में फैले 192 दस्तावेज शामिल थे, फिर भी सुनवाई के समय तक आरोप तय नहीं हुए थे और ट्रायल शुरू नहीं हुआ था। अदालत ने कहा कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर हिरासत को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता। दोनों आरोपियों को पासपोर्ट जमा करने और अदालत की अनुमति के बिना देश न छोड़ने जैसी शर्तों के साथ जमानत दी गई है।
तस्वीर: Wikimedia Commons ()
