जलवायु संकट पर देशों ने सहयोग बढ़ाया

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों के बीच दुनिया के देशों ने आपसी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से सबसे ज़्यादा नुकसान गरीब और द्वीपीय देशों को हो रहा है, इसलिए अमीर देशों से वित्तीय मदद बढ़ाने की मांग तेज़ हुई है। कई देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाने, कोयले पर निर्भरता घटाने और हरित तकनीक साझा करने के संकल्प दोहराए हैं। सौर और पवन ऊर्जा की घटती लागत से विकासशील देशों के लिए भी स्वच्छ ऊर्जा अपनाना आसान हुआ है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि उत्सर्जन घटाने की रफ्तार तेज़ नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में बाढ़, सूखे और लू जैसी चरम मौसमी घटनाएं और बढ़ेंगी, जिसका असर खेती, पानी और स्वास्थ्य पर पड़ेगा। भारत सहित कई देशों ने अपने जलवायु लक्ष्यों को दोहराते हुए कहा है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। पर्यावरण संगठनों का कहना है कि वादों को ज़मीन पर उतारना ही असली परीक्षा होगी और हर देश को अपनी ज़िम्मेदारी समय पर निभानी होगी।
